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केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को विधायक बनाकर क्या फायदा? लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी की यह चाल समझिए
Report By: सोजन्य से नव भारत टाइम्स | 29, Sep 2023

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मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के विधानसभा चुनावों में बीजेपी कंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को टिकट देने जा रही है। इसकी शुरुआत मध्य प्रदेश से हो गई है। पार्टी ने दो केंद्रीय मंत्रियों और चार सांसदों को विधानसभा का उम्मीदवार बनाया है। यह देखा जाना बाकी है कि यह दांव बीजेपी के लिए कितना सफल रहेगा।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) अगले वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले इस वर्ष होने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन सुनिश्चित करना चाहती है। इसके लिए पार्टी ने पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के प्रयोगों को प्रादेशिक चुनावों में दुहराने का फैसला किया है। इसकी एक झलक मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए जारी उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट में दिख गई। बीजेपी ने एमपी चुनावों के लिए तीन केंद्रीय मंत्रियों समेत कुल सात सांसदों को टिकट दिया है। साथ ही, कैलाश विजयवर्गीय जैसे प्रभावशाली और चर्चित चेहरे को भी इंदौर 1 सीट से विधानसभा चुनाव का टिकट दिया है। कहा जा रहा है कि भाजपा की राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के लिए आने वाली उम्मीदवारों की लिस्ट में भी कुछ ऐसा ही फॉर्मुला मिलने की पूरी संभावना है।

प. बंगाल और त्रिपुरा चुनावों में प्रयोग कर चुकी है बीजेपी


पार्टी के अतीत के प्रयोगों पर नजर डालें तो प. बंगाल और त्रिपुरा में भाजपा ने अपने केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को उतारकर मिला-जुला परिणाम ही पाया था। एक तरफ त्रिपुरा में केंद्रीय मंत्री प्रतिमा भौमिक ने 68 हजार मतों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी तो प. बंगाल में उसके पांच में से तीन सांसद हार गए थे। इसी तरह उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में भी केंद्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल को समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। तो सवाल है कि बहुत प्रभावी परिणाम नहीं आने के बाद भी बीजेपी अपने सांसदों को प्रदेशों के चुनावी चौसर में क्यों धकेलती है?

सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ाने का फायदा क्या?


बात यह है कि केंद्री की राजनीति से प्रदेशों में भेजे गए नेता भले ही चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित नहीं कर पाते हों, लेकिन उनके असर से आसपास के क्षेत्रों में भाजपा को फायदा मिल जाता है। पश्चिम बंगाल की ही बात कर लें तो भले ही वहां केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो, लोकसभा सांसद लॉकेट चटर्जी और राज्यसभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता विधानसभा चुनावों में खुद नहीं जीत सके, लेकिन उन सभी के प्रभाव से आसपास के क्षेत्रों में कई बीजेपी उम्मीदवार की किस्मत चमक गई। प. बंगाल के पिछले चुनाव में बीजेपी को 77 विधायक मिले। पांच साल पहले यह संख्या सिर्फ तीन तक सीमित थी।

इसी तरह, उत्तर प्रदेश की करहल सीट पर केंद्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल सपा प्रमुख अखिलेश यादव से हार गए, लेकिन उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री को अच्छी टक्कर दी। अखिलेश को 1 लाख 47 हजार 237 वोट मिले जबकि एसपी सिंह बघेल को 80 हजार 455 वोट हासिल हुए। लेकिन अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव के जमाने से ही सपा का गढ़ रही मैनपुरी सीट के साथ-साथ भोगांव सीट पर भी बीजेपी का कब्जा हो गया। कुल मिलाकर करहल और किशनी सीट सपा के पास गई तो मैनपुरी और भोगांव बीजेपी के खाते में आ गई। यानी परिणाम दो-दो से बराबर का रहा। बीजेपी इन्हीं अनुभवों के आधार पर मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के विधानसभा चुनावों में भी सांसदों, मंत्रियों समेत बड़े-बड़े चेहरों को टिकट देकर बड़ा दांव खेलना चाहती है।

सांसदों को विधायक बनाने पर क्यों उतारू है बीजेपी?


➤ सबसे पहला और बेहद महत्वपूर्ण कारण तो यह है कि किसी सांसद का आसपास के उन पांच-छह विधानसभाओं पर वर्चस्व होता है जिनसे मिलकर एक लोकसभा क्षेत्र बनता है। वो सांसद निधि से अपने लोकसभा क्षेत्र में आने वाले सभी विधानसभा क्षेत्रों में विकास कार्यों को अंजाम देते हैं। वहीं, संगठन के बड़े नेताओं को टिकट मिलने से निचले स्तर के कार्यकर्ताओं का उत्साह कई गुना बढ़ जाता है। कार्यकर्ताओं का पार्टी से जुड़ाव ही संगठन के नेताओं के जरिए होता है। इस कारण वो अपनी काबिलियत साबित करने के लिए चुनावों में अपने नेता की जीत सुनिश्चित करने को जी-जान लगा देते हैं। इसका फायदा पार्टी को मिलता है।

➤ बीजेपी ने विधानसभा क्षेत्रों को रणनीति बनाने की दृष्टि से चार भागों में बांटा है- ए, बी, सी और डी। ए श्रेणी की वो सीटें होती हैं जहां बीजेपी कभी हारी ही नहीं है या वो पार्टी का गढ़ रही हैं। बी श्रेणी की सीटों पर बीजेपी उम्मीदवार की जीत लगभग तय मानी जा रही है। पार्टी ने उन सीटों को सी और डी कैटिगरी में रखा है जहां उसे खुद लगता है कि प्रतिस्पर्धी दल उसपर भारी हैं। केंद्रीय मंत्रियों या सांसदों को मुख्य रूप से इन्हीं दो श्रेणियों के विधानसभा क्षेत्रों में उतारा जा रहा है।

 राजनीतिक अनुभव और लोकप्रियता
बड़े-बड़े चेहरों को चुनाव लड़ाने से पार्टी को राजनीतिक अनुभव और लोकप्रियता का लाभ मिलता है। इन नेताओं के पास चुनाव जीतने का बेहतर मौका होता है और वे पार्टी के लिए वोट जुटाने में भी मदद कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में बीजेपी ने दो केंद्रीय मंत्रियों, नरेंद्र सिंह तोमर और फग्गन सिंह कुलस्ते के साथ-साथ चार अन्य सांसदों को भी टिकट दिया है। इन नेताओं के पास लंबा राजनीतिक अनुभव है और वे क्षेत्र में लोकप्रिय हैं।
विपक्ष को कमजोर करना
बड़े-बड़े चेहरों को चुनाव लड़ाने से विपक्ष को कमजोर करने में मदद मिल सकती है। इन नेताओं के सामने खड़े होने से विपक्षी उम्मीदवारों के लिए चुनाव जीतना मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए, राजस्थान में तीन केंद्रीय मंत्रियों, गजेंद्र सिंह शेखावत, कैलाश चौधरी और अर्जुन राम मेघवाल, और चार सांसदों को टिकट दिए जाने की अटकलें लग रही हैं। इन नेताओं के सामने खड़े होना किसी भी विपक्षी उम्मीदवार के लिए आसान नहीं होगा।
दलीय इकाई को मजबूत करना
बड़े-बड़े चेहरों को चुनाव लड़ाने से पार्टी की दलीय इकाई को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। इन नेताओं के नेतृत्व में पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक अधिक सक्रिय हो सकते हैं और चुनाव प्रचार में पूरी ताकत से भाग ले सकते हैं। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को इंदौर 1 विधानसभा सीट से टिकट दिया है जिसका जमीनी असर देखने को मिल सकता है।

राजस्थान में भी होगी कई सांसदों की वापसी?

राजस्थान की राजनीतिक परंपरा के मुताबिक, इस बार बीजेपी की सरकार बननी चाहिए क्योंकि वहां हर पांच साल में सत्ता बदल जाती है। चूंकि अभी अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की सरकार चल रही है, इसलिए परंपरा के अनुसार बीजेपी का नंबर आता है। लेकिन कोई भी पार्टी परंपरा के भरोसे नहीं रहती और न रह सकती है। बीजेपी ने भी राजस्थान की सत्ता में वापसी के फुल प्रूफ प्लान को अंतिम रूप देने में जुटी है। कहा जा रहा है कि इस बार पार्टी 30 से 35 प्रतिशत विधायकों का टिकट काट सकती है। दूसरी तरफ, केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को प्रदेश के चुनावों में पार्टी का प्रभाव बढ़ाने के लिए भेजा जा सकता है। गजेंद्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल और कैलाश चौधरी वो केंद्रीय मंत्री हैं जिनका नाम विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की लिस्ट में दिखने की अटकलें लगाई जा रही हैं। इसके अलावा भागीरथ चौधरी, डॉ. किरोड़ी लाल मीणा, सुखबीर सिंह जौनपुरिया जैसे सांसदों को भी विधानसभा चुनाव लड़ने को कहा जा सकता है।


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